कॉस्मोपोलिटिसम - यह एक अच्छी या बुरी चीज़ है?

Drawing by Andrew Tkalenko

Drawing by Andrew Tkalenko

नया देश और नयी संस्कृति जिस में तुम रहते हो, जिस का अन्वेषण कर रहे हो और जिसे अपनी सभी आतंरिक शक्तिओं से समझने की कोशिश कर रहे हो, उस का एक स्वाभविक भाग बनना जितना भी चाहे, कभी पूरी तरह नहीं  बन पाओगे, क्योंकि तुम्हारे मन में एक विचार ही रहेगा कि तुम थोडा अन्य, अलग और बाहरी आदमी हो.

कुछ दिनों पहले बिज़नस यात्रा के दौरान मुझे मेरी कंपनी में काम करते हुए एक इंग्लिश जोड़ी से बात करने का मौका मिला. उन्होंने तीन सालों से ज्यादा मास्को में इस कंपनी में काम किया है. वे लोग बिलकुल कॉस्मोपोलिटन हैं, क्योंकि उन्होंने सारी दुनिया को देखा है, और विभिन्न देशों में रहे हैं  जैसे इंडोनेसिया, अरबी देश, यूरोप के देश और दोनों अमेरिका के देश. पति स्कॉट्लैंड में पैदा हुआ था और पत्नी - इंग्लैंड में. उन की  नागरिकता दोहरी  है: इंग्लिश और अमेरिकन. ऐसा लगता है कि वे किसी भी समाज में अच्छी तरह समा जाते हैं, हर एक मनुष्य से आसानी से बात कर लेते हैं. वे अत्यंत बुद्धिमान हैं. रुसी भाषा को भी सीखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन फुर्सत के अभाव के कारण इस में वे बड़ा परिणाम हासिल नहीं कर पाए हैं. बहुत खूब! विदेश में रहने के बड़े अनुभव, मास्को में गौरवमय नौकरी, उन को दी गयीं सारी सुवधाओं और बहुत से अनुवादकों के बावजूद, उन्होंने कहा  कि वे रूस में खिन्न और अकेले अनुभव करते रहते हैं, और दूसरे लोगों से casual talk कर नहीं सकते हैं.शायद यह बात विदेशी भाषा की वजह से या सांस्कृतिक विशेषताओं की वजह से या किसी और वजह से होती है. उन के विचार और भावनायें मुझे परिचित लगे.

भारत में मेरी स्थिति थोड़ी अलग थी, क्योंकि मेरी दिक्कत भाषा की नहीं थी. लेकिन मेरे ख्याल से, विदेशी समाज में अपने आप को "the other" समझने की स्थानीय भाषा के अज्ञान से असीम ज्यादा गंभीर जड़ होती है जो संस्कृति के गहरे तत्वों में विकसित हुआ है. एक दूसरे के राष्ट्र के इतिहास, पौराणिक कथाओं, धर्म, फिल्म उद्योग आदि से परिचित होने पर भी अलग-अलग देशों के लोग आम तौर पर कई विशेष रुढ़िवादियों को अपने-अपने दिमाग से निकाल नहीं पाते हैं, और दूसरों में अमेरिकेन / इंग्लिश / रुसी आदि को देखते हैं, बस मनुष्य ही को नहीं देखते. इस के आलावा दूसरों के देश के संस्कृति, इतिहास आदि जितना भी जाने, फिर भी तुम्हारे लिए वह सब बाहरी और परदेशी ही रह जायेगा, क्योंकि बचपन से तुम इस में नहीं रहे, तथा तुम्हें इस से सम्बंधित अनुभूति नहीं हुई. दिमागी जानकारी तो काफी नहीं होती.

भारत में कभी-कभी यह भी होता था कि मेरे भारतीय दोस्त किसी खेल खेलने लगते थे, जैसे, वे बॉलीवुड के फिल्मों के गीत गाने शुरू करते थे, और जिस शब्द पर किसी ने गाना ख़त्म किया था दूसरे ने उसी शब्द से नया गीत गाना शुरू किया था. मुझे यह खेल बहुत अच्छा लगा था, और चारों तरफ गाना बहुत सुरीला सुनाई देता था! लेकिन अफ़सोस की बात यह है, कि मैं इस प्रकार के खेलों में कभी भाग ले नहीं सकी, क्योंकि मुझे गानों का ज्ञान नहीं था. यह तो एक छोटा उदाहरण है, पर इस जैसी समस्या मैं अक्सर सामना करती थी: थियेटर में, मज़ाक करते समय, आदि.

"Being the other" का अनुभव तब होता है, जब तुम दूसरे देश में लम्बे समय तक रहे हो और जब तुम्हें उसी देश का सामान्य सदस्य बनने की उत्कृष्ट इच्छा है. इस सम्बन्ध में मेरा एक प्रश्न है: क्या दूसरे लोगों ने, जो विदेश में रहते हैं, इस समस्या को कभी सामना किया है कि समाज में रहते हुए भी वे खुद को अकेले महसूस करें या बड़ी कंपनी में काम करते हुए तथा बहुत सारे लोगों के सहयोग के होते हुए भी एकांत का एहसास करें? आज लोग बहुत बड़ी संख्या में सारी दुनिया में मैग्रईट करते हैं, तो क्या यह हो सकता है, कि आधुनिक पीढ़ी की प्रचालित डिप्रेशन और उदासी की बिमारियों की जड़ है कॉस्मोपोलिटिसम?

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