पोनचामी का सफ़र मसालों के साथ

जीवा पोनुचामी की अब मॉस्को में भारतीय मसालों की तीन दुकानें हैं।

जीवा पोनुचामी की अब मॉस्को में भारतीय मसालों की तीन दुकानें हैं।

भारत के मसालों का स्वाद मास्को के लिए नया है। रशिया के लोग दाे िमलियन डालर हर महीने मसालों पर खर्च करते हैं। तमिलनाडु के जीवा पोनचामी ने रूस में मसालों का सफल िबजनेस जमाया।

‘मास्को में लोगों की दोस्ती रसिया की यूनिवर्सिटी में’ इस बात का पता लगाने जीवा पोनचामी मास्को से तामिलनाडु आये थे। वह एक खेतिहर बनना चाहते थे। वह रसिया के जाड़े से तालमेल बैठाना चाहते थे और उसके नये वातावरण से लेकिन उनकी भारतीय स्वाद को रसिया के भोजन के साथ तालमेल बैठाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मास्को की दुकानों में दालों और मसालों की जानकारियाँ नहीं थी, इससे भोजन बनाना मुश्किल था।


रसिया के दुकानों में 1990ई. में ये चीज़े लुप्त होने लगी थी। रशिया के केकासस में मसाले मिलते थे, परंतु भारतीय उनकी क्वालिटी तथा मिलाप को पसंद नहीं करते थे।


जीवा के अनुसार ‘मास्को में केवल प्रसिद्ध मसाले थे काली मिर्च और कढ़ी के पत्ते और जब कोई हमारा दोस्त भारत जाता था, हम उससे 50-100 ग्राम मसाले लाने के लिये कहते थे, ये ज्यादा नहीं थे। जब हम लोग स्वयं जाते थे, हम एक साल के लिए मसाले लेकर आते थे’।
रशिया के मसाले के बाजार पिछले कुछ वर्षों में 15-20% तक बढ़ रहे हैं, एक विशेष अध्ययन के द्वारा 5,000 पकवानों पर लगभग 100 पकवानों की किताबें जो 36 ऐसे देशों को प्रदर्शित करती है जिन देशों का वातावरण गर्म है, भोजन मशालेदार हैं,स्वाद ज़्यादा हैं और मसालों का इस्तेमाल भोजन में किया गया है, जबकि हाट सास और मसालों में एंटीबैक्टीरिया के गुण है। रशिया में, चिलचिलाती गर्मी और अत्याधिक ठंड है, यहाँ ऐसी कोई समस्या नहीं है। यह बदलाव 20वीं शताब्दी में आया। पोनचामी ने स्नातक पीएफयूआर से 1994 में किया था, वहाँ अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर पीएफयूआर की इमारत के एक हिस्से में कुछ खाद्य पदार्थों को थोक बाज़ार से रीदकर छोटा-सा व्यापार शुरू कर दिया।


पोनचामी पहली बार लंदन अपने रिश्तेदारों के पास गया, उसे हैरानी हुई यह देखकर कि वहाँ अनेक ऐसीे दुकानें हैं जहाँ पारंपरिक भारतीय सामान मिलते हैं। ऐसा रशिया में नहीं था। यहाँ तक कि सोवियत यूनियन के खत्म होते ही विशेष रूप से प्रसिद्ध मसालों जैसे अदरक, धनिया गायब होने लगे।


वह भारत से अनेक डिब्बों में भरकर ेमसााले लाया, जिसे उसने किऑस्क के द्वारा बेचना शुरू किया, भारतीय वस्तुओं ने अन्य सभी को दरकिनार कर दिया और जल्दी ही वहां मसालों की पहली दुकान खुल गयी।


जब रेस्तरां ने उसके मसालों खरीदने शुरु किये, पोनचामी को यह महसूस हुआ कि छोटे-छोटे दौरे माँगों को पूरा नहीं कर पायेंगें। अगले तीन सालों में,दुकानें ग्राहकों से भरी होती थी। 10 सालों में, न केवल विदेशी बल्कि रशियन भारतीय मसालों के खरीदार हो गए। ये दुकानें अभी विकसित हो रही थी। अन्य तीन आउटलेटस और मास्को में खुल गए थे और सेंट पिटर्सबर्ग के लिए अन्य योजनाएँ थीं।


पोनचामी ने अपना व्यापार रशिया के विशेष वातावरण के साथ तालमेल बिठाया। बंदरगाहों पर कंटेनर फँस सकते हैं, वस्तुएँ जम जाएगीं,पेकिंग अत्याधिक ठंड फट जाएगीं। ‘रसिया में विदेशी व्यापारियों के लिए व्यापार शुरू करने में सबसे बड़ी बाधा भाषा है। अंग्रेजी भाषा का ज्ञान काफी नहीं है, यह समझना आवश्यक है कि आम जनता क्या कहती है? दूसरी समस्या यहाँ का कानून तथा इनमें छुपे छोटे –छोटे गड्ढे। यह आवश्यक है कि आप उनकी संस्कृति को जाने’। ऐसा पोनचामी का कहना है। एक अन्य समस्या है वहाँ का किराया जिसे व्यापार करके देना संभव नहीं है। यह आवश्यक है कि आप उनकी संस्कृति को जाने’। ऐसा पोनचामी का कहना है। परंतु इन बाधाओं के बजूद जीवा आशावादी है। रशिया के मसाले के बाजार में आर्थिक मंदी के बावजूद गिरावट नहीं आई। 100% लाभ का यह विशेष कारण था। व्यापार तथा मार्केटिंग कंपनी के अनुसार मास्को में 2 डाॅलर मिलियन के मसाले प्रति महीने खरीदे जाते हैं। ‘1990 के दशक मसाले के उपभोग का चलन गायब हो गया था। लोगों में सेहतमंद भोजन का शौक जाग रहा है इस कारण इन मसालों का चलन वापस आ रहा है’, एकतरीना पेटरोवा के द्वारा जो ब्रीम्या एंड कंपनी में कार्यरत है।


आज कल ज्यादातर लोग स्वास्थवर्धक जीवन शैली पसंद करते हैं, इस कारण दुकानें केवल मसाले तथा स्वाद का ही नहीं ध्यान रखती हैं,वरन दवा के रूप में लाभ हो इसका भी ध्यान रखती हैं। जीवा के अनुसार व्यापार को फलने-फूलने के लिए मास्को की जीवन शैली में मसालेे को स्थान दिलाना होगा। वह साल में भारत केवल व्यापार के लिए दो बार आता है, और उसे गर्व महसूस होता है यह कहते हुए कि मेरे दो घर है।


भारतीय मसाले के दुकान अपने नाम की वजह से विकसित कर रहे हैं, बेचने के सामान केवल भारत के नहीं वरन चीन,जापान,थाईलैंड एवं मेक्सिको के भी हैं। अन्य सामान पीएफ्यू के छात्रों की माँग पर बढ़ायें गयें हैं,जो कि चायना, लैटिन अमेरिका, अरब और अफ्रीका के हैं। ग्राहक दिन प्रति दिन बढ़ रहे हैं, कोई चाय के लिए, कोई आयुर्वेदिक ,काॅस्मेटिक और बालों के रंग के लिये तथा अन्य भारतीय सभ्यता से ली गई है, आशा है कि इन व्यंजनों के द्वारा अच्छे से समझ पाएंगें।

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